भारत के पहले रॉकेट लॉन्च के 60 वर्ष हुए पूरे, साइकिल और बैलगाड़ी पर ले गए थे रॉकेट अलग-अलग भारत के पहले रॉकेट लॉन्च के 60 वर्ष हुए पूरे, साइकिल और बैलगाड़ी पर ले गए थे रॉकेट अलग-अलग भाग

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21 नवंबर 1963 को केरल के एक जिले थुम्बा से भारत के पहले रॉकेट ने सफलतापूर्वक उड़ान भरी थी। यह अंतरिक्ष की ओर भारत का पहला कदम था। इस वर्ष पहले रॉकेट के लॉन्च किए जाने का 60 वर्ष मनाया जा रहा हैं। इसी दिन से भारत ने अंतरिक्ष मिशन में अपना झंडा गाड़ना शुरू किया था। इस रॉकेट का नाम “नाईकी अपाचे” रखा गया था। इस रॉकेट लॉन्च के बाद से इसरो ने कई बड़े खिताब अपने नाम किए हैं। भारत के पहले सफलतापूर्वक रॉकेट लॉन्च के 60 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष में 25 नवंबर 2023 को विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा हैं। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर इसरो के अध्यक्ष एस. सोमनाथ मौजूद होंगे। इस कार्यक्रम की शुरुआत विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के केंद्र मंत्री जितेंद्र सिंह द्वारा किया जाएगा। आज के दौर में भारत के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए सफलतापूर्वक रॉकेट लॉन्च चाहे वह चंद्रयान हो या मंगलयान लेकिन शुरुवाती दिनों में इसकी शुरुआत इतनी आसान नहीं थी।

 

साइकिल से ले जाते हैं रॉकेट के भाग

कैसे हुई पहले रॉकेट लॉन्च की तैयारी

उसे वक्त असंभव सा दिखने वाला यह मिशन को सफल बनाना इतना भी आसान नहीं था। इस पूरे अभियान को सफल बनाने में थुंबा जिले के लोगों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। साथ ही इस जिले के चर्च को भी स्पेस सेंटर में बदल दिया गया। यह सुनकर जितना अटपटा लग रहा है इसके पीछे की कहानी भी उतनी ही मजेदार है। 1960 में भारत के पहले रॉकेट को लॉन्च करने के लिए विक्रम साराभाई एक सही जगह की तलाश में लगे थे। उनकी तलाश पूरी होती है केरल में बसे एक छोटे से गांव थुंबा में‌। अगर इस गांव की बात करें तो यह गांव दिखने में केरल के अन्य गांव से बिल्कुल भी अलग नहीं था। इस गांव के लोगों का जीवन यापन मछली पकड़ कर होती थी। लेकिन इस गांव में एक ऐसी खास बात थी जो इसे दूसरे गांव से अलग बनाती थी। दरअसल, इस गांव में बना संत मैरी मैग्डलीन नाम का चर्च बेहद ही खास था। यह चर्च पृथ्वी के चुंबकीय भूमध्य रेखा (मैग्नेटिक इक्वेटर) पर बना हुआ था। चुंबकीय भूमध्य रेखा पृथ्वी पर बनी एक ऐसी काल्पनिक लाइन है जो कि पृथ्वी के उन सभी बिंदुओं को एक दूसरे से जोड़ती है जहां चुंबकीय ध्रुव की नीति कोण शून्य (angle of dep zero of magnetic neddle) पर होता है। इसी वजह से विक्रम साराभाई इस चर्च को स्पेस सेंटर में बदलने के लिए अपने कुछ साथियों के साथ चर्च के विशप बर्नार्ड परेरा से मिलने पहुंचे। विक्रम साराभाई के उन साथियों में एपीजे अब्दुल कलम भी मौजूद थे। विक्रम साराभाई ने चर्च के विशप बर्नार्ड परेरा के समक्ष अपनी सारी बात रखी और अपनी साइंटिफिक कारण के लिए उनके चर्च को मांगा। लेकिन सारी बात सुनने के बावजूद विशप बर्नार्ड परेरा ने कोई जवाब नहीं दिया और विक्रम साराभाई को अगले रविवार को चर्च में होने वाले बैठक में आने को कहा। इसके बाद रविवार को विक्रम साराभाई अपने साथियों के साथ बैठक में पहुंचे तो विशप बर्नार्ड परेरा ने धार्मिक उपदेश के दौरान ही पूरे मामले को चर्च में मौजूद लोगों के समक्ष रखा। कुछ देर तक पूरे चर्च में शांति छा गई। जिस वक्त विक्रम साराभाई को लगा कि इस बात से लोगों के बीच धार्मिक हिंसा हो सकती है। हालांकि, कुछ वक्त की शांति के बाद सभी ने चर्च को साइंटिस्ट को सौंपने की अनुमति दे दी थी। डॉ एपीजे अब्दुल कलाम की किताब ‘इगनाइटेड माइंड्स’ में इस पूरे वाक्य का बहुत बेहतर तरीके से वर्णन किया गया है।

साइकिल और बैलगाड़ी पर ले गए थे रॉकेट अलग-अलग भाग

संत मैरी मैग्डलीन के नाम से जाने जाना वाला चर्च अब तुंबा “इक्टोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन” के नाम से जाने जाना लगा। इस स्टेशन को बेहद कम अनुदान में बनाया गया और बिल्कुल ना के बराबर सुविधा होने के बावजूद भी भारत का पहला रॉकेट लॉन्च किया गया। भारत के पहले रॉकेट “निइकी अपाचे” जिसे नासा ने बनाया था उसके अलग-अलग भाग को लाने के लिए साइकिल और बैलगाड़ी का प्रयोग किया गया था। हालांकि, इतनी कम सुविधा और इतनी मुश्किलों के बाद भी भारत के पहले रॉकेट को 21 नवंबर 1963 को सफलतापूर्वक लांच किया।

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Author Since: November 22, 2023